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Gita Chapter one Summary | गीता प्रथम अध्याय सारांश

Gita Chapter one Summary: 4 मिनट में गीता का पहला अध्याय पढ़ें

संजय की आँखों से कुरुक्षेत्र का वर्णन

गीता के प्रथम अध्याय में धृतराष्ट्र ने संजय से युद्ध का वर्णन पूछा। संजय जो अपनी दिव्य दृष्टि से महाभारत के इस ऐतिहासिक युद्ध देख पा रहे थे, उन्होंने कुरुक्षेत्र भूमि के दृश्य का वर्णन किया।

दोनों ही सेनायें कुरुक्षेत्र में एक दूसरे के सामने खड़ी है। पांडवों की सेना ने व्यूहरचना (चक्रव्यूह की तरह ये भी एक प्रकार की सेना की रचना है) की है। यूँ तो कौरवों की सेना पांडवों से अधिक थी पर इस रचना के कारण कौरवों से बड़ी दिखाई दे रही थी।

पांडवों की इस रचना को देख दुर्योधन के मन में शंका उत्पन्न हुई और वे उपाय के लिए गुरु द्रोणाचार्य के पास जा पहुंचे। दुर्योधन ने गुरु द्रोणाचार्य से भीष्म पितामह की सभी ओर से रक्षा करने की विनती की क्योंकि उनके नेतृत्व में कौरवों को हराना असंभव था।

शंखों की गर्जना

इसी समय भीष्म पितामह ने उच्च स्वर में सिंह की दहाड़ जैसा शंख बजाय। इसके बाद कौरव सेना ने शंख, मृदंग और युद्ध के नगाड़े बजाये।

ऐसे में पांडव कैसे पीछे रहते। पहले अर्जुन, अर्जुन के साथ श्री कृष्ण, पांडवों और पांडव सेना ने भी शंख की ऐसी गर्जना की, कि पूरा आकाश उस आवाज से गूंज उठा और धरती कांप उठी।

अर्जुन का धर्मसंकट

इसके पश्चात् अर्जुन ने गांडीव उठाकर भगवान श्री कृष्ण से कहा, “हे अच्युत(जिसका कभी पराभव न हो)! मेरे रथ को दोनों सेनाओं के बीच खड़ा कीजिये।”

अर्जुन वास्तव में अपने सारे प्रतिद्वंदियों को देखना चाहते थे जो दुर्बुद्धि दुर्योधन के साथ लड़ने आएं थे। अर्जुन ने दोनों ही सेनाओं में खड़े अपने ताऊ, चाचाओं, दादाओं, परदादाओं, गुरुओं, मामाओं, भाइयों, पुत्रों, पौत्रों तथा मित्रों को देखा।

उन सभी को देख कर अर्जुन के हाथों से गांडीव निसटने लगा, मुँह सुख गया और शरीर ऐसे कांपने लगा की वे खड़े भी नहीं रह पा रहे थे।

उन्होंने भगवान श्री कृष्ण से कहा की वे दोनों ओर अपने ही सगे सम्बन्धियों को देख रहे है। इस युद्ध से अपने ही कुल का नाश कर के उनका कल्याण कैसे हो सकता है? ऐसे राज्य को और ऐश्वर्य को पा कर क्या लाभ है?

कुल के नाश से सनातन कुल-धर्म और जाती-धर्म नष्ट हो जाता है और पाप फ़ैल जाता है। जिनका कुल-धर्म नष्ट हो गया ऐसे मनुष्य केवल नर्क के भागी होते है।

हम लोग बुद्धिमान होकर भी राज्य और सुख के लोभ से यह पाप करने के लिए तैयार हो गए। उनका मुझे शस्त्ररहित मार देना भी मेरे लिए अधिक कल्याणकारी होगा।

ऐसा कह कर अर्जुन शस्त्र छोड़ कर रथ के पीछे बैठ गए।

यही पर पहला अध्याय (Gita Chapter one Summary) समाप्त होता है और अगले अध्याय में पढ़ें की भगवान कृष्ण ने उनकी इस दुविधा में कैसे सहायता की।

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