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Gita Chapter 2 in Short | गीता दूसरा अध्याय सारांश

Gita Chapter 2 in Short | गीता दूसरा अध्याय सारांश
5 मिनट में

अर्जुन अपने ही सगे सम्बन्धियों को देख दुविधा में पड़ गए और युद्ध करने से पीछे हटने लगे। उन्होंने यह तक कह दिया कि मैं युद्ध नहीं करूँगा।

भगवान कृष्ण ने कहा कि अर्जुन इस असमय में मोह सही नहीं है। इससे न तो स्वर्ग की, और न तो कीर्ति की प्राप्ति होगी। इस मोह के प्रति नपुंसकता को मत प्राप्त हो। ह्रदय की इस तुच्छ दुर्बलता को त्याग कर युद्ध के लिए खड़े हो जाओ।

आत्मा का अमरत्व

जिनके प्राण जा चुके है या नहीं गए उनका शोक एक पंडित नहीं मनाता। हमारे जन्म से भी पहले हम थे और मृत्यु के बाद भी रहेंगे, क्योंकि हमारी आत्मा अमर है। आत्मा ना तो किसी को मारता है और ना किसी से मारा जा सकता है। जैसे व्यक्ति पुराने कपड़े निकाल कर नए कपड़े पहन लेता है उसी तरह आत्मा पुराने शरीर को छोड़ कर नया शरीर ग्रहण करता है।

आत्मा को शस्त्र नहीं काट सकते, आग जला नहीं सकती, जल गला नहीं सकता और ना हवा सूखा सकती है। जो जन्मा है उसकी मृत्यु निश्चित है और जो मर चूका उसका जन्म भी। इस बात को जानकर भी तुम्हारा शोक करना उचित नहीं है। इसलिए तुम युद्ध करो।

तुम एक क्षत्रिय हो और तुम्हें भय नहीं होना चाइए। यह युद्ध, तुम्हारे जैसे वीर क्षत्रिय के लिये तो स्वर्ग के खुले द्वार समान है। ना लड़ने पर तुम पाप को प्राप्त होगे और जीवित लोग तुम्हारी अपकीर्ति का वर्णन करेंगे जो माननीय पुरुष के लिये मरण से बढ़कर है। तुम युद्ध में हार कर स्वर्ग या जीतकर पृथ्वी का राज्य भोगोगे। इसलिए युद्ध के लिये निश्चय कर के खड़े हो जाओ।

स्थिर बुद्धि और समभाव

इसके बाद श्री कृष्ण अर्जुन को सम रूप से कर्म करते रहने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं जो व्यक्ति भोगो में लिप्त है जो केवल फल की इच्छा से कर्म करते हैं और जिनके लिये स्वर्ग से बड़ी कोई वस्तु नहीं उनकी परमात्मा में अटल और स्थिर निश्चय वाली बुद्धि नहीं होती।

तुम्हारा कर्म में ही अधिकार है, उसके फलों में कभी नहीं। इच्छा के साथ किये गए कार्य निचले स्तर के होते हैं।

स्थिर बुद्धि का व्यक्ति
स्थिर बुद्धि का व्यक्ति

अर्जुन भगवान से पूछते हैं की स्थिर बुद्धि का व्यक्ति कैसा होता है?

तब भगवान कहते हैं दुःख और सुख दोनों में सम हो, जिसका राग, भय और क्रोध नष्ट हो गए हों ऐसा व्यक्ति स्थिर बुद्धि कहा जाता है। वो शुभ और अशुभ वस्तु को प्राप्त कर न तो खुश होता है और न दुःख मनाता है।

यदि पुरुष के मन में थोड़ी सी भी आसक्ति (मोह / attachment) हो तो विषय फिर से बलपूर्वक इन्द्रियों को हर लेती है। इसलिए जिस पुरुष की इन्द्रियाँ वश में होती है उसी की बुद्धि स्थिर होती जाती है। वही पुरुष शांति को प्राप्त होता है और अंत में ब्रम्हानंद को प्राप्त होता है।

लेखक की ओर से

भगवान इस प्रकार हमें सदैव सम रहकर कर्म करने के लिये प्रेरित करते है।

इस अध्याय में 72 श्लोक है, गीता का यह अध्याय इतना महान हैं की गाँधी जी ने इसके आखरी 19 श्लोक ज़ुबानी याद कर रखे थे जो उन्हें भी कर्म करने का प्रोत्साहन देते थे।

Gita Chapter 2 in Short | गीता दूसरा अध्याय सारांश

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