Diwali Vrat Katha Hindi: क्यों एक को दरिद्र कर लक्ष्मी जी दूसरे के पास चली जाती हैं?

Diwali Vrat Katha Hindi: क्यों एक को दरिद्र कर लक्ष्मी जी दूसरे के पास चली जाती हैं?

Diwali Vrat Katha Hindi

ऋषियों ने सनतकुमार जी से प्रश्न किया- ”भगवन्‌! राजा बलि ने लक्ष्मी जी व देवताओं को अपने वश में कर लिया था तो फिर लक्ष्मी जी ने उसका त्याग कब किया?’!

सनतकुमार जी ने उत्तर दिया- ”हे ऋषियो! एक बार देवराज इन्द्र से भयभीत होकर राजा बलि कहीं जा छिपा। इन्द्र ने उसे ढूंढ़ने का प्रयास किया। तभी उन्होंने देखा कि बलि गधे का रूप धारण कर एक खाली घर में समय व्यतीत कर रहा है।

इन्द्र वहाँ पहुंचे और बलि से उनकी बातचीत होने लगी। बलि ने इन्द्र को तत्वज्ञान। का उपदेश देते हुए काल-समय की महत्ता समझाई। उनमें बातचीत चल ही रही थी कि उसी समय दैत्यराज बलि के शरीर से अत्यंत दिव्य रूपी एक स्त्री निकली।

उसे देख इन्द्र ने पूछा- ”हे दैत्यराज! तुम्हारे शरीर से निकलने वाली यह आभायुक्त स्‍त्री देवी है अथवा आसुरी या मानवी?”

राजा बलि ने उत्तर दिया- ”राजन! यह देवी है न आसुरी और न ही मानवी। यदि तुम इसके सम्बन्ध में अधिक जानना चाहते हो तो फिर इसी से पूछो।”

इतना सुन इन्द्र ने हाथ जोड़कर पूछा- ”देवी! तुम कौन हो और दैत्यराज का परित्याग कर मेरी ओर क्‍यों बढ़ रही हो ?”

तब मुस्कुराती हुई शक्तिरूपा स्त्री बोली- ”हे देवेन्द्र! मुझे न तो दैत्यराज प्रहलाद के पुत्र विरोचन ही जानते हैं और न उनके पुत्र यह बलि ही। शास्त्रवेत्ता मुझे दुस्सहा, भूति और लक्ष्मी के नामों से पुकारते हैं। परन्तु तुम तथा अन्य देवगण मुझे भली प्रकार नहीं पहचानते।”

इन्द्र ने प्रश्न किया- ”हे देवी! जब इतने दीर्घकाल तक आपने द्वैत्यराज में वास किया है तो फिर अब इनमें ऐसा कौन-सा दोष उत्पन्न हो गया, जो आप इनका परित्याग कर रही हैं?

आप यह भी बताने की कृपा कीजिए कि आपने- मुझमें ऐसा कौन-सा गुण देखा है जो मेरी ओर अग्रसर हो रही हैं?”

लक्ष्मी जी ने उत्तर दिया–‘हे आर्य! मैं जिस स्थान पर निवास कर रही हूँ, वहाँ से मुझे विधाता नहीं हटा सकता, क्‍योंकि मैं सदैव समय के प्रभाव से ही एक को त्याग कर दूसरे के पास जाती हूं। इसलिए तुम बलि का अनादर न करते हुए इनका सम्मान करो।”

इन्द्र ने पूछा–”हे देवी! कृपा कर यह बताइए कि अब आप असुरों के पास क्यों नहीं रहना चाहतीं?”

लक्ष्मी जी बोलीं- ”मैं उसी स्थान पर रहती हूँ जहाँ सत्य, दान, व्रत, तप, पराक्रम तथा धर्म रहते हैं। इस समय असुर इससे परामुख हो गए हैं। पूर्वजन्म में यह सत्यवादी जितेन्द्रिय तथा ब्राह्मणों के हितैषी थे, परन्तु अब यह ब्राह्मणों से द्वेष करने लगे हैं। अभक्ष्य भोजन करते हैं।

साथ ही धर्म की मर्यादा तोड़कर विभिन्‍न प्रकार के मनमाने आचरण करते हैं। पहले ये उपवास एवं तप करते थे, प्रतिदिन सूर्योदय से पूर्व जागते थे और यथासमय सोते थे। परन्तु अब यह देर से जागते तथा आधी रात के बाद सोते हैं।

पूर्वकाल में यह दिन में शयन नहीं करते थे। दीन-दुखियों, अनाथों, वृद्ध, रोगी तथा शक्तिहीनों को नहीं सताते थे और उनकी अन्न आदि से हर प्रकार की सहायता करते थे।

पहले ये गुरुजन के आज्ञाकारी तथा सभी काम समय पर करते थे। उत्तम भोजन बनाकर अकेले नहीं खाते थे,
पहले दूसरों को देकर बाद में स्वयं ग्रहण करते थे।

प्राणीमात्र को समान समझते हुए इनमें सौहार्द, उत्साह, निरहंकार, सत्य, क्षमा, दया, दान, तप एवं वाणी में सरलता आदि सभी गुण विद्यमान थे। मित्रों से प्रेम-व्यवहार करते थे। परन्तु अब इनमें क्रोध की मात्रा बढ़ गई है। आलस्य, निद्रा, अप्रसन्‍नता, असन्तोष, कामुकता तथा विवेकहीनता।

यह कहकर लक्ष्मी जी इन्द्र की तरफ अग्रसर हो गईं।

You Read: Diwali vrat katha hindi: क्यों एक को दरिद्र कर लक्ष्मी जी दूसरे के पास चली जाती हैं?

यह दिवाली की दूसरी कथा थी पहली कथा पढ़ने के लिए निचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें। यूँ तो कई कथाएं प्रचलित हैं लेकिन सबका मूल एक ही है

इस वेबसाइट को और अच्छा बनाने के लिए हमे अपने सुझाव जरूर दें।

https://karmachakra.com/diwali-ki-katha
https://karmachakra.com/laxmi-pujan-vidhi-hindi
https://karmachakra.com/laxmi-ji-ki-aarti-in-hindi
परिवार एवं मित्रों के साथ शेयर करें -

Leave a Reply

Your email address will not be published.